दीन ए ह़क़ के रफ़ीक़ों पे लाखों सलाम।

दीन ए ह़क़ के रफ़ीक़ों पे लाखों सलाम।
मुर्तज़ा के अ़ज़ीज़ों पे लाखों सलाम।
क़ुदसियों के अमीरों पे लाखों सलाम।
मुस्तुफ़ा के ह़बीबों पे लाखों सलाम।
हँसते – हँसते जो ह़क़ पर फ़िदा हो गए।
करबला के शहीदों पे लाखों सलाम।
ख़ाके पा जिनकी ख़ाक ए शिफ़ा बन गई।
उन ह़क़ीक़ी तबीबों पे लाखों सलाम।
जो भी शैदा ए आल ए पयम्बर हुए।
उन सभी ख़ुश नसीबों पे लाखों सलाम।
भूखे रह कर भी खाना खिलाते थे जो।
सब्र के उन शकीबों पे लाखों सलाम।
जो बयाँ शाने शब्बीर करते रहे।
हर सदी के अदीबों पे लाखों सलाम।
रास्ता ख़ुल्द तकती थी जिनका फ़राज़।
उन बहत्तर नसीबों पे लाखों सलाम।

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