ऐ शहंशाह-ए-मदीना! अस्सलातु वस्सलाम
ऐ शहंशाह-ए-मदीना! अस्सलातु वस्सलामज़ीनत-ए-अर्श-ए-मुअल्ला! अस्सलातु वस्सलाम रब्बी हब ली उम्मती कहते हुए पैदा हुएहक़ ने फ़रमाया कि बख़्शा, अस्सलातु वस्सलाम दस्त-बस्ता सब फ़रिश्ते पढ़ते हैं उन पर दुरूदक्यूँ न हो फिर विर्द अपना अस्सलातु वस्सलाम मोमिनो! पढ़ते रहो तुम अपने आक़ा पर दुरूदहै फ़रिश्तों का वज़ीफ़ा अस्सलातु वस्सलाम बुत-शिकन आया ये कह कर, सर के … Read more