दुनिया के ऐ मुसाफ़िर मंज़िल तेरी क़बर है
दुनिया के ऐ मुसाफ़िर मंज़िल तेरी क़बर है दुनिया के ऐ मुसाफ़िर ! मंज़िल तेरी क़बर है तय कर रहा है जो तू दो दिन का ये सफ़र है जब से बनी है दुनिया लाखों-करोड़ों आए बाक़ी रहा न कोई, मिट्टी में सब समाए इस बात को न भूलो, सब का यही हशर … Read more