पेश-ए-हक़ मुज़्दा शफ़ा’अत का सुनाते जाएँगे

पेश-ए-हक़ मुज़्दा शफ़ा’अत का सुनाते जाएँगे आप रोते जाएँगे, हम को हँसाते जाएँगे दिल निकल जाने की जा है, आह ! किन आँखों से वो हम से प्यासों के लिए दरिया बहाते जाएँगे कुश्तगान-ए-गर्मी-ए-महशर को वो जान-ए-मसीह आज दामन की हवा दे कर जिलाते जाएँगे गुल खिलेगा आज ये उन की नसीम-ए-फ़ैज़ से ख़ून रोते … Read more