बलग़ल उला बि कमालिही,
बलग़ल उला बि कमालिही, कशफ़द दुजा बि जमालिही, हसुनत जमीउ खिसालिही, सलू अलैहि वा आलिही। न कहीं से दूर हैं मंज़िलें, न कोई क़रीब की बात है, जिसे चाहें उसको नवाज़ दें, ये दर-ए-हबीब की बात है। जिसे चाहा दर पे बुला लिया, जिसे चाहा अपना बना लिया, ये बड़े करम के हैं फैसले, ये … Read more