बलग़ल उला बि कमालिही,

बलग़ल उला बि कमालिही,
कशफ़द दुजा बि जमालिही,
हसुनत जमीउ खिसालिही,
सलू अलैहि वा आलिही।

न कहीं से दूर हैं मंज़िलें,
न कोई क़रीब की बात है,
जिसे चाहें उसको नवाज़ दें,
ये दर-ए-हबीब की बात है।

जिसे चाहा दर पे बुला लिया,
जिसे चाहा अपना बना लिया,
ये बड़े करम के हैं फैसले,
ये बड़े नसीब की बात है।

वो ख़ुदा नहीं, बि-ख़ुदा नहीं,
मगर वो ख़ुदा से जुदा नहीं,
वो हैं क्या, मगर वो क्या नहीं,
ये मुहिब-ए-हबीब की बात है।

तेरे हुस्न से, तेरी शान तक,
है निगाह ओ अक़्ल का फ़ासला,
ज़रा बईद का ज़िक्र है,
वो ज़रा फ़रेब की बात है ये।

वो मचल के राह में रह गई,
ये तड़प के दर से लिपट गई,
वो किसी अमीर की आह थी,
ये किसी ग़रीब की बात है।

मैं बुरों से लाख बुरा सही,
मगर उनसे है मेरा वासिता,
मेरी लाज रखना मेरे ख़ुदा,
ये तेरे हबीब की बात है।

तुझे ऐ मुनव्वर बे-नवा,
दर-ए-शाह से चाहिए और क्या,
जो नसीब हो कभी सामना,
तो बड़े नसीब की बात है।

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