दामाद-ए-मुस्तफ़ा है वो ज़ौज-ए-बतूल है

दामाद-ए-मुस्तफ़ा है वो ज़ौज-ए-बतूल हैमेरा अली तो शेर-ए-ख़ुदा-ओ-रसूल है हसनैन जिनके बेटों ने पाईं शहादतेंशहज़ादगाँ आपके जन्नत के फूल हैं नाम-ए-अली से मैंने किया ये मुशाहिदासुन्नी का चेहरा ऐसा लगे कि वो फूल है और ख़वारिज के सामने जब कह दिया अलीवो हो गया है ऐसे कि ख़ार-ए-बबूल है अहमद रज़ा ने लिख दिया है … Read more