दामाद-ए-मुस्तफ़ा है वो ज़ौज-ए-बतूल है
मेरा अली तो शेर-ए-ख़ुदा-ओ-रसूल है
हसनैन जिनके बेटों ने पाईं शहादतें
शहज़ादगाँ आपके जन्नत के फूल हैं
नाम-ए-अली से मैंने किया ये मुशाहिदा
सुन्नी का चेहरा ऐसा लगे कि वो फूल है
और ख़वारिज के सामने जब कह दिया अली
वो हो गया है ऐसे कि ख़ार-ए-बबूल है
अहमद रज़ा ने लिख दिया है फ़ातिमा कली
हसनैन के लिए कि वो जन्नत के फूल हैं
मुश्किल कुशाई कीजिए मुश्किल कुशा अली
उनका है वास्ता जो कि बिन्त-ए-रसूल है
दुनिया समझ रही है कि मेरा कोई नहीं
ऐ हसदों तुम्हारी सरासर ये भूल है
कह दीजिए ये मेरा सग-ए-दर है
आज भी दुनिया समझ रही है मुनव्वर फ़ुज़ूल है