दर-ए-नबी पर पड़ा रहूँगा पड़े ही रहने से काम होगा

दर-ए-नबी पर पड़ा रहूँगा पड़े ही रहने से काम होगा   दर-ए-नबी पर पड़ा रहूँगा, पड़े ही रहने से काम होगा कभी तो क़िस्मत खुलेगी मेरी, कभी तो मेरा सलाम होगा किए ही जाऊँगा ‘अर्ज़-ए-मतलब, मिलेगा जब तक न दिल का मतलब न शाम-ए-मतलब की सुब्ह होगी, न ये फ़साना तमाम होगा इसी तवक़्क़ो’ पे … Read more