दर-ए-नबी पर पड़ा रहूँगा पड़े ही रहने से काम होगा

दर-ए-नबी पर पड़ा रहूँगा पड़े ही रहने से काम होगा

 

दर-ए-नबी पर पड़ा रहूँगा, पड़े ही रहने से काम होगा
कभी तो क़िस्मत खुलेगी मेरी, कभी तो मेरा सलाम होगा

किए ही जाऊँगा ‘अर्ज़-ए-मतलब, मिलेगा जब तक न दिल का मतलब
न शाम-ए-मतलब की सुब्ह होगी, न ये फ़साना तमाम होगा

इसी तवक़्क़ो’ पे जी रहा हूँ, यही तमन्ना जिला रही है
निगाह-ए-लुत्फ़-ओ-करम न होगी, तो मुझ को जीना हराम होगा

ख़िलाफ़-ए-मा’शूक़ कुछ हुआ है न कोई ‘आशिक़ से काम होगा
ख़ुदा भी होगा उधर ही, ऐ दिल ! जिधर वो ‘आली-मक़ाम होगा

जो दिल से है माइल-ए-पयंबर, ये उस की पहचान है मुक़र्रर
कि हर दम उस बे-नवा के लब पर दुरूद होगा सलाम होगा

मरीज़-ए-फ़ुर्क़त जिएगा क्यूँकर, जिया तो जीना हराम होगा
न चैन होगा, ब-रंग-ए-बिस्मिल तड़प तड़प कर तमाम होगा

हुई जो कौसर पे बारयाबी तो कैफ़-ए-बेकस की धज ये होगी
बग़ल में मीना, नज़र में साक़ी, ख़ुशी से हाथों में जाम होगा

शायर:
आलमगीर ख़ान कैफ़

संदर्भ:
दीवान-ए-कैफ़

ना’त-ख़्वाँ:
ज़ुल्फ़िक़ार अली हुसैनी

 

 

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