तू शम-ए-रिसालत है आलम तेरा परवाना
तू शम-ए-रिसालत है आलम तेरा परवानातू माह-ए-ुबुव्वत है, ऐ जल्वा-ए-जानाना जो साकी-ए-कौसर के चेहरेसेनक्ाब उेहर दिल बने मय-खाना, हर औँख हो पैमाना दिल अपना चमक उठे ईमान की तल’अत सेकर ऑँखें भी नूरानी, ऐ जल्वा-ए-जानाना! सरशार ‘मुझे कर दे इक जाम-ए-लबालब सेता-हश्र रहे, साकी आबाद ये मय-ख़ाना.- तुम आए छटी बाज़ी, रौनक़ हुई फिर ताज़ीका’बा … Read more