तू शम-ए-रिसालत है आलम तेरा परवाना

तू शम-ए-रिसालत है आलम तेरा परवाना
तू माह-ए-ुबुव्वत है, ऐ जल्वा-ए-जानाना

जो साकी-ए-कौसर के चेहरेसेनक्ाब उे
हर दिल बने मय-खाना, हर औँख हो पैमाना

दिल अपना चमक उठे ईमान की तल’अत से
कर ऑँखें भी नूरानी, ऐ जल्वा-ए-जानाना!

सरशार ‘मुझे कर दे इक जाम-ए-लबालब से
ता-हश्र रहे, साकी आबाद ये मय-ख़ाना
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तुम आए छटी बाज़ी, रौनक़ हुई फिर ताज़ी
का’बा हुबा फिर का’बा, कर डाला था बुत-खाना

उस दर की हुजूरी ही इस्यॉ की दवा ठहरी
है ज़हर-ए-म’आसी का तयबा ही शिफफ़़ा-ख़ाना

हर फूल में बू तेरी, हर शम अ में जौ तेरी
बुलबुल है तेरा बुलबुल, परवाना है परवाना

पीते हैं तेरे दर का, खाते हैं तेरे दर का
पानी है तेरा पानी, दाना है तेरा दाना

संग-ए-दर-जानाँ पर करता हूँ जबीं-साई
सज्दा न समझ, नज्दी! सर देता ह नज़राना

गिर पड़ के यहाँ पहुँचा, मर मर के इसे पाया
डछूटेन, डलाही।! अब संग-ए-दर-ए-जानाना

वो कहते न कहते कुछ, वो करते न करते कुछ
ऐ काश।! वो सुन लेते, मुझ से मेरा अफ़साना

ऑरखो मेंमेरेतू आ औरदिल मेंमेरे बस जा
दिल-शाद मुझे फ़रमा, ऐ जल्वा-ए-जानाना’

आबाद इसे फ़रमा, वीरॉँ दिल-ए-नूरी
जल्वे तेरे बस जाएँ, आबाद हो वीराना

सरकार के जल्वों से रौशन है दिल-ए-नूरी
ताहशरहेरीशन नूरी का येकाशाना

शायरः
मुस्तफ़़ा रज़ा ख़ान

नात-खवाँः
ओवैस कादरी
मुश्ताक कादरी
असद इक़बाल

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