ताजदार-ए-हरम हो निगाह-ए-करम
क़िस्मत में मेरी चैन से जीना लिख दे डूबे ना कभी मेरा सफ़ीना लिख दे जन्नत भी गँवारा है मगर मेरे लिए ऐ कातिब-ए-तक़दीर मदीना लिख दे ताजदार-ए-हरम ताजदार-ए-हरम हो निगाह-ए-करम हम गरीबों के दिन भी संवर जाएंगे हामी-ए बे-कसां क्या कहेगा जहां आपके दर से खाली अगर जाएँगे ताजदार-ए-हरम कोई अपना नहीं गम … Read more