तेरे दयार के एहसान भूलते ही नहीं

तेरे दयार के एहसान भूलते ही नहीं
इनायतों के वो सामान भूलते ही नहीं

वो जालियां, वो दरीचे, वो मिंबर ओ मेहराब
वो दर, वो रौज़ा, वो दरबान भूलते ही नहीं

जबीं पे नूर, नज़र में अदब, दिलों में गुदाज़
हरेम-ए-नाज़ के मेहमान भूलते ही नहीं

बा वक़्त-ए-इज़्न-ए-हुज़ूरी वो आँसुओं की तड़प
वो आरज़ुएँ वो अरमान भूलते ही नहीं

मलाइका भी ये जन्नत में जाकर कहते हैं
कि उस नगर के ख़याबान भूलते ही नहीं

नज़र बदल गई, मंज़र बदल गए सारे
तेरी निगाह के फ़ैज़ान भूलते ही नहीं

जो पर्दा पर्दा फ़रोज़ाँ हुए तेरे दर पर
रुमूज़-ए-हक़ के वो इरफ़ान भूलते ही नहीं

इता’अतों के जो वादे हुए थे रोज़-ए-अलस्त
तेरे करम से वो पैमान भूलते ही नहीं

जो तेरे चाहने वालों ने अपने ख़ून से लिखे
मुहब्बतों के वो उनवान भूलते ही नहीं

तेरा ज़ुहूर वो इनआम है कि हम जिसको
बक़ौल-ए-सूरह-ए-रहमान भूलते ही नहीं

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