अल्लाह रे क्या बारगह-ए-ग़ौस-ए-जली है
अल्लाह रे क्या बारगह-ए-ग़ौस-ए-जली है गर्दन को झुकाए हुए एक एक वली है हर-गाम पे सज्दे की तमन्ना है जबीं को ये किस का दर-ए-नाज़ है ? ये किस की गली है ? नबवी मींह, ‘अलवी फ़स्ल, बतूली गुलशन हसनी फूल, हुसैनी है महकना तेरा आस्ताँ है ये किस शाह-ए-ज़ीशान का, मरहबा मरहबा ! क़ल्ब … Read more