बे-ख़ुद किए देते हैं अंदाज़-ए-हिजाबाना,
आ दिल में तुझे रख लूँ, ऐ जल्वा-ए-जानाना!
इतना तो करम करना, ऐ चश्म-ए-करीमाना!
जब जान लबों पर हो, तुम सामने आ जाना।
जी चाहता है तोहफ़े में भेजूँ मैं उन्हें आँखें,
दर्शन का तो दर्शन हो, नज़राने का नज़राना।
पीने को तो पी लूँगा, पर अर्ज़ ज़रा सी है,
अजमेर का साक़ी हो, बग़दाद का मय-ख़ाना।
‘बेदम’! मेरी क़िस्मत में चक्कर हैं इसी दर के,
छूटा है न छूटेगा मुझ से दर-ए-जानाना।