वफ़ा का नूर दुनिया में कभी मद्धम नहीं होता
ग़म-ए-शब्बीर बढ़ता जा रहा है कम नहीं होता
वो दिल दिल ही नहीं पत्थर के टुकड़े से भी बदतर है
कि जिस दिल में नबी के लाडले का ग़म नहीं होता
आ ग़म-ए-शब्बीर आ सीने लगा कर चूम लूँ
कर्बला की ख़ाक को आँसू पिला कर चूम लूँ
ज़े ग़म अली का ज़ुल्म के जंगल में घिर गया
सहरा का चाँद शाम के बादल में घिर गया
था गुल अज़ारे फ़ातिमा ख़ारों में घिर गया
तन्हा अली का लाल हज़ारों में घिर गया
आ मेरा असगर सदा देती थी सुग़रा रात दिन
आ तेरी राहों को मैं पलकें बिछा के चूम लूँ