फर्श पर रहकर अर्श पर जाना सबके बस की बात नहीं है

फर्श पर रहकर अर्श पर जाना सबके बस की बात नहीं है
जाके ख़ुदा को देख के आना सबके बस की बात नहीं है

फख्र से बोली दाई हलीमा गोद में लेकर आक़ा को
आमना बी के लाल को पाना सबके बस की बात नहीं है

इज़्ज़त से हँसकर हँसते हँसते बोले बिलाल आक़ा से यूँ
इश्क़-ए-नबी में कोड़े खाना सबके बस की बात नहीं है

करके इशारा मेरे नबी ने चाँद के टुकड़े फरमाया
डूबा सूरज को पलटना सबके बस की बात नहीं है

जान-ए-मुबारक को ख़तरे में डाल के इश्क़-ए-अहमद में
साँप के बिल में आग रखना सबके बस की बात नहीं है

मेरा अलाउद्दीन है साबिर बोले सबसे बाबा फरीद
भूखा रहकर खाना खिलाना सबके बस की बात नहीं है

यूँ तो तरन्नुम के माहिर हैं लाखों शाकिर दुनिया में
झूम के ऐसी नात सुनाना सबके बस की बात नहीं है

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