आक़ा आक़ा बोल बंदे आक़ा आक़ा बोल

आक़ा आक़ा बोल बंदे आक़ा आक़ा बोल / Aaqa Aaqa Bol Bande Aaqa Aaqa Bol
आक़ा आक़ा बोल, बंदे ! आक़ा आक़ा बोल
ज़िक्र-ए-नबी तू करता जा, ये ज़िक्र बड़ा अनमोल

ऐसा दिन भी आ जाए सरकार के दर पे बैठे हों
लब ख़ामोश ज़बाँ बन जाएँ आँसू ‘अर्ज़ा करते हों
उन के दर पर रोने वाले ! दिल से कुछ तो बोल
आक़ा आक़ा बोल, बंदे ! आक़ा आक़ा बोल

सरकार-ए-दो-‘आलम प्यार-ए-आक़ा जिधर से गुज़रा करते थे
शजर गवाही देता था और पत्थर कलमा पढ़ते थे
नूर-ए-ख़ुदा के मुन्किर अब तो अपनी आँखें खोल
आक़ा आक़ा बोल, बंदे ! आक़ा आक़ा बोल

आओ चलो, दीवानो ! सारे शहर-ए-मदीना चलते हैं
मेरी क्या औक़ात है, सब ही उन के दर से पलते हैं
ग़ैरों को भी देते हैं वो बिन माँगे बिन मोल
आक़ा आक़ा बोल, बंदे ! आक़ा आक़ा बोल

जब से होश सँभाला है, मैं उन की ना’तें पढ़ता हूँ
गुस्ताख़ी न हो जाए, मैं सँभल सँभल के चलता हूँ
माँ की दु’आओं का सदक़ा है ऐसा मिला माहौल
आक़ा आक़ा बोल, बंदे ! आक़ा आक़ा बोल

राशिद ! नातें लिखना पढ़ना ये है बढ़ा ए’ज़ाज़
उन के करम के सदक़े ही से ऊँची है परवाज़
ना’त-ए-नबी तू सुनाए जा और कानों में रस गोल
आक़ा आक़ा बोल, बंदे ! आक़ा आक़ा बोल

शायर:
मुहम्मद राशिद आज़म

ना’त-ख़्वाँ:
मुहम्मद राशिद आज़म
फ़रहान अली क़ादरी
सय्यिद रैहान क़ादरी

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top