अल्लाह रे क्या बारगह-ए-ग़ौस-ए-जली है

अल्लाह रे क्या बारगह-ए-ग़ौस-ए-जली है
गर्दन को झुकाए हुए एक एक वली है

हर-गाम पे सज्दे की तमन्ना है जबीं को
ये किस का दर-ए-नाज़ है ? ये किस की गली है ?

नबवी मींह, ‘अलवी फ़स्ल, बतूली गुलशन
हसनी फूल, हुसैनी है महकना तेरा

आस्ताँ है ये किस शाह-ए-ज़ीशान का, मरहबा मरहबा !
क़ल्ब हैबत से लर्ज़ां है इंसान का, मरहबा मरहबा !
है असर बज़्म पर किस के फ़ैज़ान का, मरहबा मरहबा !
घर बसाने मेरी चश्म-ए-वीरान का, मरहबा मरहबा !

चाँद निकला हसन के शबिस्तान का, मरहबा मरहबा !

आस्ताँ है ये किस शाह-ए-ज़ीशान का, मरहबा मरहबा !
आस्ताँ है ये किस शाह-ए-ज़ीशान का, मरहबा मरहबा !

सर की ज़ीनत ‘अमामा है ‘इरफ़ान का, मरहबा मरहबा !
जुब्बा तन पर मुहम्मद के एहसान का, मरहबा मरहबा !
रंग आँखों में ज़हरा के फ़ैज़ान का, मरहबा मरहबा !
रूप चेहरे पे आयात-ए-क़ुरआन का, मरहबा मरहबा !

सज के बैठा है नौ-शाह जीलान का, मरहबा मरहबा !

आस्ताँ है ये किस शाह-ए-ज़ीशान का, मरहबा मरहबा !
आस्ताँ है ये किस शाह-ए-ज़ीशान का, मरहबा मरहबा !

बज़्म-ए-कौन-ओ-मकाँ को सजाया गया, आज स़ल्ले-‘अला
साइबाँ रहमतों का लगाया गया, आज स़ल्ले-‘अला
अंबिया, औलिया को बुलाया गया, आज स़ल्ले-‘अला
इब्न-ए-ज़हरा को दूल्हा बनाया गया, आज स़ल्ले-‘अला

‘उर्स है आज महबूब-ए-सुब्हान का, मरहबा मरहबा !

आस्ताँ है ये किस शाह-ए-ज़ीशान का मरहबा मरहबा
आस्ताँ है ये किस शाह-ए-ज़ीशान का, मरहबा मरहबा !

आसमाँ-मंज़िलत किस का ऐवान है, वाह क्या शान है !
आज ख़ल्क़-ए-ख़ुदा किस की मेहमान है, वाह क्या शान है !
‘ला-तख़फ़’ किस का मशहूर फ़रमान है, वाह क्या शान है !
बिल-यक़ीं वो शहंशाह-ए-जीलान है, वाह क्या शान है !

हक़ दिया जिस को क़ुदरत ने ए’लान का, मरहबा मरहबा !

आस्ताँ है ये किस शाह-ए-ज़ीशान का, मरहबा मरहबा !
आस्ताँ है ये किस शाह-ए-ज़ीशान का, मरहबा मरहबा !

हर तरफ़ आज रहमत की बरसात है, वाह क्या बात है !
आज खुलने पे क़ुफ़्ल-ए-मुहिम्मात है, वाह क्या बात है !
चार-सू जल्वा-आराई-ए-ज़ात है, वाह क्या बात है !
कोई भरने पे कश्कोल-ए-हाजात है, वाह क्या बात है !

जागने को मुक़द्दर है इंसान का, मरहबा मरहबा !

आस्ताँ है ये किस शाह-ए-ज़ीशान का, मरहबा मरहबा !
आस्ताँ है ये किस शाह-ए-ज़ीशान का, मरहबा मरहबा !

कोई महव-ए-फ़ुग़ाँ, कोई ख़ामोश है, अब किसे होश है
साज़-ए-मुतरिब की लय नग़्मा-बरदोश है, अब किसे होश है
‘अक़्ल हैरत के पर्दे में रू-पोश है, अब किसे होश है
बज़्म की बज़्म मस्ती दर आग़ोश है, अब किसे होश है

पी के साग़र ‘अली के ख़ुमिस्तान का, मरहबा मरहबा !

आस्ताँ है ये किस शाह-ए-ज़ीशान का, मरहबा मरहबा !
आस्ताँ है ये किस शाह-ए-ज़ीशान का, मरहबा मरहबा !

क्या हसीं मंज़र-ए-जूद-ओ-इकराम है, दा’वत-ए-‘आम है
अहल-ए-दिल की नज़र मस्ती-आशाम है, दा’वत-ए-‘आम है
हश्र तक मुद्दत-ए-गर्दिश-ए-जाम है, दा’वत-ए-‘आम है
दस्त-ए-जिब्रील मसरूफ़-ए-इत’आम है, दा’वत-ए-‘आम है

खाओ सदक़ा ‘अली शाह-ए-मर्दान का, मरहबा मरहबा !

आस्ताँ है ये किस शाह-ए-ज़ीशान का, मरहबा मरहबा !
आस्ताँ है ये किस शाह-ए-ज़ीशान का, मरहबा मरहबा !

शम’-ए-तौहीद दिल में जला कर पियो, दिल लगा कर पियो
शाह-ए-बतहा की ख़ैरात पा कर पियो, दिल लगा कर पियो
नग़्मा-ए-कासा-ए-वस्ल गा कर पियो, दिल लगा कर पियो
आँख मेहर-ए-‘अली से मिला कर पियो, दिल लगा कर पियो

ख़ुद पिलाने पे साक़ी है जीलान का, मरहबा मरहबा !

आस्ताँ है ये किस शाह-ए-ज़ीशान का, मरहबा मरहबा !
आस्ताँ है ये किस शाह-ए-ज़ीशान का, मरहबा मरहबा !

है ‘अजब हुस्न का बाँकपन सामने, इक चमन सामने
अहल-ए-ततहीर हैं ख़ैमा-ज़न सामने, पंजतन सामने
है ये रू-ए-हसन की फबन सामने या हसन सामने
जल्वा-फ़रमा हैं ग़ौस-ए-ज़मन सामने, ज़ौ-फ़िगन सामने

देखिए क्या बने चश्म-ए-हैरान का, मरहबा मरहबा !

आस्ताँ है ये किस शाह-ए-ज़ीशान का, मरहबा मरहबा !
आस्ताँ है ये किस शाह-ए-ज़ीशान का, मरहबा मरहबा !

गुलशन-ए-मुस्तफ़ा की फबन और है, ये चमन और है
शाह-ए-अबरार की अंजुमन और है, ये चमन और है
बू-ए-गुलदस्ता-ए-पंजतन और है, ये चमन और है
शान-ए-आल-ए-हुसैन-ओ-हसन और है, ये चमन और है

सरमदी रंग है इस गुलिस्तान का, मरहबा मरहबा !

आस्ताँ है ये किस शाह-ए-ज़ीशान का, मरहबा मरहबा !
आस्ताँ है ये किस शाह-ए-ज़ीशान का, मरहबा मरहबा !

फ़क़्र की सल्तनत तुर्फ़ा-सामान है, रहमत ऐवान है
इस के ज़ेर-ए-नगीं क़ल्ब-ए-इंसान है, ‘इज्ज़-‘उनवान है
किस का दस्त-ए-नज़र कासा-गरदान है, ‘अक़्ल हैरान है
इक वली ज़ेब-ए-औरंग-ए-‘इरफ़ान है, वाह क्या शान है

सर झुके है यहाँ मीर-ओ-सुल्तान का, मरहबा मरहबा !

आस्ताँ है ये किस शाह-ए-ज़ीशान का, मरहबा मरहबा !
आस्ताँ है ये किस शाह-ए-ज़ीशान का, मरहबा मरहबा !

हर घड़ी मेहरबाँ ज़ात-ए-बारी रहे, फ़ैज़ जारी रहे
ख़ाक-बोसी पे बाद-ए-बहारी रहे, फ़ैज़ जारी रहे
‘आलम-ए-कैफ़ में बज़्म सारी रहे, फ़ैज़ जारी रहे
बेख़ुदी तेरे मस्तों पे तारी रहे, फ़ैज़ जारी रहे

मेंह बरसता रहे तेरे एहसान का, मरहबा मरहबा !

आस्ताँ है ये किस शाह-ए-ज़ीशान का, मरहबा मरहबा !
आस्ताँ है ये किस शाह-ए-ज़ीशान का, मरहबा मरहबा !

‘अर्श-ए-इसरार तक जिस की परवाज़ है, तुर्फ़ा-अंदाज़ है
‘इल्म-ए-लाहूत का हासिल ए’ज़ाज़ है, तुर्फ़ा-अंदाज़ है
ज़ोहद-ओ-तक़्वा में यकता-ओ-मुमताज़ है, तुर्फ़ा-अंदाज़ है
आबरू-ए-चमन क़ामत-ए-नाज़ है, तुर्फ़ा-अंदाज़ है

पीर-ए-मेहर-ए-‘अली क़ुत्ब-ए-दौरान का, मरहबा मरहबा !

आस्ताँ है ये किस शाह-ए-ज़ीशान का, मरहबा मरहबा !
आस्ताँ है ये किस शाह-ए-ज़ीशान का, मरहबा मरहबा !

गोलड़े की ज़मीं कितनी मस’ऊद है, ख़ित्ता-ए-जूद है
इब्न-ए-मौला ‘अली जिस में मौजूद है, ख़ित्ता-ए-जूद है
क्या हसीं मंज़र-ए-शान-ए-मा’बूद है, ख़ित्ता-ए-जूद है
हर अयाज़ इस का हम-दोश-ए-महमूद है, ख़ित्ता-ए-जूद है

औज पाया है बिर्जीस-ओ-कैवान का, मरहबा मरहबा !

आस्ताँ है ये किस शाह-ए-ज़ीशान का,मरहबा मरहबा !
आस्ताँ है ये किस शाह-ए-ज़ीशान का, मरहबा मरहबा !

तेरे दीवाने हाज़िर हैं सरकार में, आज दरबार में
सर झुकाए जनाब-ए-गुहर-बार में, आज दरबार में
बन के साइल तेरी बज़्म-ए-अनवार में, आज दरबार में
यूसुफ़-ए-मिस्र-ए-दिल तेरे बाज़ार में, आज दरबार में

जश्न है क्या दिल-अफ़रोज़ ‘इरफ़ान का, मरहबा मरहबा !

आस्ताँ है ये किस शाह-ए-ज़ीशान का, मरहबा मरहबा !
आस्ताँ है ये किस शाह-ए-ज़ीशान का, मरहबा मरहबा !

दर-ब-दर मुफ़्त की ठोकरें खाए क्यूँ, हाथ फैलाए क्यूँ
माँगने कू-ए-अग़्यार में जाए क्यूँ, हाथ फैलाए क्यूँ
उस के नामूस-ए-ग़ैरत पे हर्फ़ आए क्यूँ, हाथ फैलाए क्यूँ
दिल क़ना’अत की ज़ौ से न चमकाए क्यूँ, हाथ फैलाए क्यूँ

जो नमक-ख़्वार हो पीर-ए-पीरान का, मरहबा मरहबा !

आस्ताँ है ये किस शाह-ए-ज़ीशान का, मरहबा मरहबा !
आस्ताँ है ये किस शाह-ए-ज़ीशान का, मरहबा मरहबा !

शाह-ए-जीलाँ की चौखट सलामत रहे, ता-क़यामत रहे
नक़्श-ए-पा का चमन पुर-करामत रहे, ता-क़यामत रहे
ख़ल’अत-ए-इज्तिबा ज़ेब-ए-क़ामत रहे, ता-क़यामत रहे
सर पे वलियों का ताज-ए-इमामत रहे, ता-क़यामत रहे

सिलसिला ग़ौस-ए-आ’ज़म के फ़ैज़ान का, मरहबा मरहबा !

आस्ताँ है ये किस शाह-ए-ज़ीशान का, मरहबा मरहबा !
आस्ताँ है ये किस शाह-ए-ज़ीशान का,मरहबा मरहबा !

वारिस-ए-ख़ातमुल-मुर्सलीं आप हैं, बिल-यक़ीं आप हैं
क़स्र-ए-ज़हरा का नक़्श-ए-हसीं आप हैं, बिल-यक़ीं आप हैं
दीन-ए-बरहक़ के मुह्य-ओ-मु’ईं आप हैं, बिल-यक़ीं आप हैं
बज़्म-ए-‘इरफ़ाँ के मसनद-नशीं आप हैं, बिल-यक़ीं आप हैं

हर वली तिफ़्ल है इस दबिस्तान का,मरहबा मरहबा !

आस्ताँ है ये किस शाह-ए-ज़ीशान का, मरहबा मरहबा !
आस्ताँ है ये किस शाह-ए-ज़ीशान का, मरहबा मरहबा !

मज़हर-ए-ज़ात-ए-रब्ब-ए-क़दीर आप हैं, दस्त-गीर आप हैं
कारवान-ए-करम के अमीर आप हैं, दस्त-गीर आप हैं
शाह-ए-बग़दाद पीरान-ए-पीर आप हैं, दस्त-गीर आप हैं
इस नसीर-ए-हज़ीं के नसीर आप हैं, दस्त-गीर आप हैं

कोई हम-सर नहीं आप की शान का, मरहबा मरहबा !

आस्ताँ है ये किस शाह-ए-ज़ीशान का, मरहबा मरहबा !
आस्ताँ है ये किस शाह-ए-ज़ीशान का, मरहबा मरहबा !

शायर:
पीर नसीरुद्दीन नसीर

नशीद-ख़्वाँ:
नुसरत फ़तेह अली ख़ान
ज़ोहैब अशरफ़ी
मुहम्मद आमिर फ़य्याज़ी
महमूद-उल-हसन अशरफ़ी
क़ारी मोहसिन क़ादरी

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