Faqeeron Ka Hai Kya Chahe Jahan Basti Basa Baithe Lyrics
फ़क़ीरों का है क्या चाहे जहाँ बस्ती बसा बैठे
अली वाले जहाँ बैठे वहीं जन्नत बना बैठे
फ़राज़-ए-दार हो, मक़्तल हो, ज़िंदाँ हो कि सहरा हो
जहाँ ज़िक्र-ए-अली छेड़ा वहाँ दीवाने आ बैठे
कोई मौसम, कोई भी वक़्त, कोई भी इलाक़ा हो
जली इश्क़-ए-अली की शमअ और परवाने आ बैठे
अली वालों का मरना भी कोई मरने में मरना है
चले अपने मकाँ से और अली के दर पे जा बैठे
इधर रुख़्सत किया सब ने, उधर आए अली लेने
यहाँ सब रो रहे थे, हम वहाँ महफ़िल सजा बैठे
अभी मैं क़ब्र में लेटा ही था इक नूर सा फैला
मेरी बालीं पे ख़ुद आ कर अली-ए-मुर्तज़ा बैठे
ये कौन आया कि इस्तिक़बाल को सब अंबिया उठे
न बैठेगा कोई तब तक, न जब तक मुस्तफ़ा बैठे