दरपेश हो तैबा का सफ़र कैसा लगेगा
गुज़रें जो वहाँ शाम-ओ-सहर कैसा लगेगा
ऐ काश मदीने में मुझे मौत यूँ आए
क़दमों में हो सरकार के सर कैसा लगेगा
ऐ प्यारे ख़ुदा देखूँ मैं सरकार का जलवा
मिल जाए दुआ को जो असर कैसा लगेगा
आक़ा का गदा हूँ ऐ जहन्नम तू भी सुन ले
वो कैसे जले जो कि गुलाम-ए-मदनी हो
ऐ काश मैं बन जाऊँ मदीने का मुसाफिर
फिर रोती हुई को बरात चली हो
जब दूर से है इतना हसीन गुम्बद-ए-ख़ज़रा
इस पार ये आलम है उधर कैसा लगेगा
आ जाएँ मेरे घर में अगर रहमत-ए-आलम
मैं कैसा लगूँगा मेरा घर कैसा लगेगा
हज की सआदत तो यूँ पाते हैं हज़ारों
मुर्शिद का साथ हो जो सफ़र कैसा लगेगा
पाई “मुनव्वर” ने क़ज़ा दर पे नबी के
आ जाए वतन ऐसी ख़बर कैसा लगेगा