दिल में इश्क़-ए-नबी की हो ऐसी लगन,
रूह तड़पती रहे दिल मचलता रहे।
ज़िंदगी का मज़ा है कि हर साँस से,
या मुहम्मद मुहम्मद निकलता रहे।
या मुहम्मद मुहम्मद मैं कहता रहा,
नूर के मोतियों की लड़ी बन गई।
आयतों से मिलाता रहा आयतें,
फिर जो देखा तो नात-ए-नबी बन गई।
जो भी आँसू बहे मेरे महबूब के,
सब के सब अब्र-ए-रहमत के छींटे बने।
छा गई रात जब ज़ुल्फ़ लहरा गई,
जब तबस्सुम किया चाँदनी बन गई।
ये तो माना कि जन्नत है बाग़-ए-हसीं,
ख़ूबसूरत है सब खुल्द की सरज़मीं।
हुस्न-ए-जन्नत को फिर जब समेटा गया,
सर्वर-ए-अम्बिया की गली बन गई।
जब छिड़ा तज़किरा उन के रुख़्सार का,
वद्दुहा पढ़ लिया वल-क़मर कह दिया।
सूरतों की तिलावत भी होती रही,
नात भी हो गई बात भी बन गई।
सबसे साइम ज़माने में माज़ूर था,
सबसे बेकस था बेबस था मजबूर था।
उन को रहम आ गया मेरे हालात पर,
मेरी अज़्मत मेरी बेबसी बन गई।
दिल में इश्क़-ए-नबी की हो ऐसी लगन,
रूह तड़पती रहे दिल मचलता रहे।
ज़िंदगी का मज़ा है कि हर साँस से,
या मुहम्मद मुहम्मद निकलता रहे।