हम दर-ए-आक़ा पे सर अपना झुका लेते हैं
सच बताना अरे दुनिया, तेरा क्या लेते हैं
उस को आँखों पे बिठाते हैं ज़माने वाले
जिस को महबूब-ए-ख़ुदा अपना बना लेते हैं
वक़्त की क़ैद नहीं है, ये करम की बातें
जब भी सरकार की मर्ज़ी हो बुला लेते हैं
ग़म के मारों का तबीबो न करो कोई इलाज
हम ग़म-ए-इश्क़-ए-नबी में भी मज़ा लेते हैं
पत्थरों तुम तो हो पत्थर मगर आक़ा मेरे
तुम से गर चाहें तो कलमा भी पढ़ा लेते हैं
जब नहीं मिलती कहीं से भी सुकूँ की दौलत
तेरी महफ़िल, तेरे दीवाने सजा लेते हैं
गुंबद-ए-ख़ज़रा ख़ुदा तुझ को सलामत रखे
देख लेते हैं तुझे, प्यास बुझा लेते हैं