खिला मेरे दिल की कली, ग़ौस-ए-आ’ज़म !

 

 

खिला मेरे दिल की कली, ग़ौस-ए-आ’ज़म !
मिटा क़ल्ब की बे-कली, ग़ौस-ए-आ’ज़म !

मेरे चाँद ! मैं सदक़े, आजा इधर भी
चमक उठे दिल की गली, ग़ौस-ए-आ’ज़म !

तेरे रब ने मालिक किया तेरे जद को
तेरे घर से दुनिया पली, ग़ौस-ए-आ’ज़म !

वो है कौन ऐसा नहीं जिस ने पाया
तेरे दर पे दुनिया ढली, ग़ौस-ए-आ’ज़म !

कहा जिस ने ‘या ग़ौस अग़िसनी’ तो दम में
हर आई मुसीबत टली, ग़ौस-ए-आ’ज़म !

नहीं कोई भी ऐसा फ़रियादी, आक़ा !
ख़बर जिस की तुम ने न ली, ग़ौस-ए-आ’ज़म !

मेरी रोज़ी मुझ को ‘अता कर दो, आक़ा !
तेरे दर से दुनिया ने ली, ग़ौस-ए-आ’ज़म !

न माँगूँ मैं तुम से तो फिर किस से माँगूँ ?
कहीं और भी है चली, ग़ौस-ए-आ’ज़म !

सदा गर यहाँ मैं न दूँ तो कहाँ दूँ ?
कोई और भी है गली, ग़ौस-ए-आ’ज़म !

जो क़िस्मत हो मेरी बुरी, अच्छी कर दो
जो ‘आदत हो बद, कर भली, ग़ौस-ए-आ’ज़म !

तेरा मर्तबा आ’ला क्यूँ हो न, मौला !
तू है इब्न-ए-मौला-‘अली, ग़ौस-ए-आ’ज़म !

क़दम गर्दन-ए-औलिया पर है तेरा
तू है रब का ऐसा वली, ग़ौस-ए-आ’ज़म !

जो डूबी थी कश्ती वो दम में निकाली
तुझे ऐसी क़ुदरत मिली, ग़ौस-ए-आ’ज़म !

हमारा भी बेड़ा लगा दो किनारे
तुम्हें ना-ख़ुदाई मिली, ग़ौस-ए-आ’ज़म !

तबाही से नाओ हमारी बचा दो
हवा-ए-मुख़ालिफ़ चली, ग़ौस-ए-आ’ज़म !

तुझे तेरे जद से, उन्हें तेरे रब से
है ‘इल्म-ए-ख़फ़ी-ओ-जली, ग़ौस-ए-आ’ज़म !

मेरा हाल तुझ पर है ज़ाहिर कि पुतली
तेरी लौह से जा मिली, ग़ौस-ए-आ’ज़म !

ख़ुदा ही के जल्वे नज़र आए जब भी
तेरी चश्म-ए-हक़-बीं खुली, ग़ौस-ए-आ’ज़म !

फ़िदा तुम पे हो जाए नूरी-ए-मुज़्तर
ये है इस की ख़्वाहिश-दिली, ग़ौसे-आ’ज़म !

शायर:
मुस्तफ़ा रज़ा ख़ान नूरी

ना’त-ख़्वाँ:
ओवैस रज़ा क़ादरी

 

 

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