मैं ख़ुद पर नाज़ करता हूँ, रज़ा का नाम लेवा हूँ,
मैं सुन्नी ख़ुश अक़ीदा हूँ, रज़ा का नाम लेवा हूँ।
मैं नामूस-ए-रिसालत पर हमेशा देता हूँ पहरा,
मैं दरबान-ए-सहाबा हूँ, रज़ा का नाम लेवा हूँ।
रज़ा वाले ही होते हैं खड़े मज़्लूम के हक़ में,
वफ़ा का दर्स देता हूँ, रज़ा का नाम लेवा हूँ।
सहाबा और अहल-ए-बैत से करते हैं जो उल्फ़त,
उन्हीं के पीछे चलता हूँ, रज़ा का नाम लेवा हूँ।
ख़ुदा का है करम मुझ पर, ऐ ‘राग़िब’! क़ादरी हूँ मैं,
मैं सग अख़्तर रज़ा का हूँ, रज़ा का नाम लेवा हूँ।