मैं मुद्दत से इस आस पर जी रही हूँ
खुदा कब बुला ले मुझे अपने घर में
मैं मुद्दत से इस आस पर जी रही हूँ
कभी तो सुनेगा दुआएँ वो मेरी
कभी तो सुनेगा सदाएँ वो मेरी
मैं मुद्दत से इस आस पर जी रही हूँ
जो लोगों से सुन-सुन के नक़्शे हैं खींचे
हक़ीक़त में होंगे मन्ज़िर वो कैसे
कभी जा के देखूँ खुद आँखों से अपनी
मैं मुद्दत से इस आस पर जी रही हूँ
खुदा ने उतारा जिसे आसमान से
किया नसब था जिसको पैग़म्बरों ने
उसी हजरे अस्वद का बोसा मैं ले लूँ
मैं मुद्दत से इस आस पर जी रही हूँ
मेरे सामने हो वो काबे की चौखट
वो रुक्ने यमानी, वो मिज़ाबे रहमत
मैं सहने हरम में करूँ जा के सज्दे
मैं मुद्दत से इस आस पर जी रही हूँ
वो शहर-ए-हरम, वो मदीने की गलियाँ
वो अरफ़ात का दिन, मिना की वो रातें
मयस्सर कभी हों हमें सारे जलवे
मैं मुद्दत से इस आस पर जी रही हूँ
मेरे सामने हो वो गुम्बदे ख़िज़रा
वो रौज़े की जाली, वो जन्नत का गोशा
कभी चूम लूँ जा के ख़ाक-ए-मदीना
मैं मुद्दत से इस आस पर जी रही हूँ
नहीं है भरोसा कोई ज़िन्दगी का
उसी को खबर है, वही जानता है
बुलाएगा हमको वो मरने से पहले
बुला लीजिए मुझको वो मरने से पहले
मैं मुद्दत से इस आस पर जी रही हूँ
खुदा कब बुला ले मुझे अपने घर में
मैं मुद्दत से इस आस पर जी रही हूँ