नूर की अंजुमन फ़ातिमा

नूर की अंजुमन फ़ातिमा
मरक़ज़-ए-पंजतन फ़ातिमा

अर्श से बन के आई है तू
मुर्तज़ा की दुल्हन फ़ातिमा

कहकशाँ से ज़्यादा हसीं
तेरे घर का चमन फ़ातिमा

तेरी ममता के हैं दो नयन
इकक हुसैन इक हसन फ़ातिमा

ख़ुल्द का अर्श पर है दिमाग़
छू के तेरे चरन फ़ातिमा

कब्ज़ी किसी माँ ने पैदा किए
फिर हुसैन-ओ-हसन फ़ातिमा

बन गया तेरा बाग़-ए-फ़दक़
ग़ाज़ियों का कफ़न फ़ातिमा

बोली ज़ैनब से रूह-ए-अली
सर उठा और बन फ़ातिमा

तेरे शौहर के दर से मिला
हमको रिज़्क़-ए-सुख़न फ़ातिमा

ग़ैर ने जिसको देखा नहीं
तेरा वो पैरहन फ़ातिमा

है मशीअत तेरे साथ यूँ
जैसे छोटी बहन फ़ातिमा

है ये क़ौल-ए-नबी ऐ ‘सरोश’
मेरा तन मेरा मन फ़ातिमा

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