नूरी नूरी वहाँ का समाँ है, शहर ऐसा है मेरे नबी का
नाज़ करता है का’बा भी जिस पर, वो मदीना है मेरे नबी का
कोई भी उन के जैसा नहीं है, ढूँडने से भी मिलता नहीं है
हुस्न-ए-यूसुफ़ भी जिस पर फ़िदा है, ऐसा चेहरा है मेरे नबी का
गुलशन-ए-दीन-ए-हक़ को बचाया, अपने नाना का वा’दा निभाया
हक़ की ख़ातिर गला जो कटाया, वो नवासा है मेरे नबी का
लौट कर कोई आया न ख़ाली, भर के दामन को लौटा सवाली
जिस जगह है फ़रिश्तों का मेला, आस्ताना है मेरे नबी का
मुस्तफ़ा से मोहब्बत करेगा, जाँ की बाज़ी लगाता रहेगा
ज़ुल्म से वो भला क्या डरेगा, जो दिवाना है मेरे नबी का
ना’त-ख़्वाँ:
शहबाज़ रज़ा नूरी