तुम्हारे दर पे जो मैं बारयाब हो जाऊँ…
कसम ख़ुदा की शहा कामयाब हो जाऊँ!!!
जो पाऊँ बोसा-ए-पाए हुज़ूर क्या कहना…
मैं ज़र्रा शम्स ओ क़मर का जवाब हो जाऊँ!!!
मेरी हक़ीक़त-ए-फ़ानी भी कुछ हक़ीक़त है…
मरूँ जो आज ख़याल ओ ख़्वाब हो जाऊँ!!!
जहाँ के क़ौस-ए-क़ुज़ह से फ़रेब खाएँ क्यूँ…
मैं अपने क़ल्ब ओ नज़र का हिजाब हो जाऊँ!!!
जहाँ की बिगड़ी उसी आस्ताँ से बनती है…
मैं क्यूँ न वक्फ़-ए-दर-ए-आँ जनाब हो जाऊँ!!!
तुम्हारा नाम लिया है तलातुम-ए-ग़म में…
मैं अब तो पार रिसालत-मआब हो जाऊँ!!!
ये मेरी दूरी बदल जाए क़ुर्ब से अख्तर…
अगर वो चाहें तो मैं बारयाब हो जाऊँ!!!