कोई दुनिया-ए-अता में नहीं हमता तेरा

कोई दुनिया-ए-अता में नहीं हमता तेरा
हो जो हातिम को मुयस्सर ये नज़ारा तेरा।

कह उठे देख के बख्शीश में ये रुतबा तेरा,
वाह! क्या जुदो करम है शहे बतहा तेरा।

नहीं सुनता ही नहीं माँगने वाला तेरा,
कुछ बशर होने के नाते तुझे ख़ुद सा जाने।

और कुछ महज़ पयामी ही ख़ुदा का जाने,
इन की औक़ात ही क्या है कि ये इतना जाने।

फ़र्श वाले तेरी शौकत का उलू क्या जाने,
खुशरवा अर्श पे उड़ता है फरेरा तेरा।

मुझ से ना चीज़ पे है तेरी इनायत कितनी,
तू ने हर गाम पे की मेरी हिमायत कितनी।

क्या बताऊँ! तेरी रहमत में है वुसअत कितनी,
एक मैं क्या! मेरी इसयाँ की हक़ीक़त कितनी।

मुझ से सौ लाख को काफ़ी है इशारा तेरा,
नज़र-ए-उशशाक़-नबी है ये मेरा हर्फ़-ए-ग़रीब।

मिम्बर-ए-वाज़ पे लड़ते रहें आपस में ख़तीब,
ये अक़ीदा रहे अल्लाह करे मुझ को नसीब।

मैं तो मालिक ही कहूँगा कि हो मालिक के हबीब,
यानी महबुबो मोहिब में नहीं मेरा तेरा।

कई पुश्तों से ग़ुलामी का ये रिश्ता है बहाल,
यहीं तिफ़ली-ओ-जवानी के बिताए मह-ओ-साल।

अब बुढ़ापे में ख़ुदारा हमें यूँ दर से न टाल,
तेरे टुकड़ों पे पले ग़ैर की ठोकड़ पे न डाल।

झिड़कियाँ खाएँ कहाँ छोड़ के सदक़ा तेरा,
तुझ से हर चंद वो है क़दरो फ़ज़ाइल में रफ़िअ।

कर नसीर! आज मगर फ़िकरे रज़ा की तौसीअ,
पास है उस के शफ़ाअत का वसीला भी वक़ीअ।

तेरी सरकार में लाता है रज़ा उस को शफ़ीअ,
जो मेरा ग़ौस है और लाडला बेटा तेरा।

Leave a Comment