वो सू-ए-लालाज़ार फिरते हैं

वो सू-ए-लालाज़ार फिरते हैं
तेरे दिन, ऐ बहार ! फिरते हैं

जो तेरे दर से यार फिरते हैं
दर-ब-दर यूँ ही ख़्वार फिरते हैं

आह कल ‘ऐ़श तो किये हम ने
आज वो बे-क़रार फिरते हैं

उन के ईमा से दोनों बागों पर
ख़ैल-ए-लैल-ओ-नहार फिरते हैं

हर चराग़-ए-मज़ार पर क़ुदसी
कैसे परवाना-वार फिरते हैं

उस गली का गदा हूँ मैं जिस में
माँगते ताजदार फिरते हैं

जान हैं जान क्या नज़र आए
क्यूँ ‘अदू गिर्द-ए-ग़ार फिरते हैं

फूल क्या देखूँ मेरी आँखों में
दश्त-ए-तयबा के ख़ार फिरते हैं

लाखों क़ुदसी हैं काम-ए-ख़िदमत पर
लाखों गिर्द-ए-मज़ार फिरते हैं

वर्दियाँ बोलते हैं हरकारे
पहरा देते सवार फिरते हैं

रखिए जैसे हैं ख़ाना-ज़ाद हैं हम
मोल के ‘ऐबदार फिरते हैं

हाए ग़ाफ़िल ! वो क्या जगह है जहाँ
पाँच जाते हैं चार फिरते हैं

बाएँ रस्ते न जा, मुसाफ़िर ! सुन
माल है, राह-मार फिरते हैं

जाग सुनसान बन है रात आई
गुर्ग बहर-ए-शिकार फिरते हैं

नफ़्स ये कोई चाल है ज़ालिम
जैसे ख़ास-ए-बिजार फिरते हैं

कोई क्यूँ पूछे तेरी बात, रज़ा !
तुझ से कुत्ते हज़ार फिरते हैं

शायर:
इमाम अहमद रज़ा ख़ान

ना’त-ख़्वाँ:
ओवैस रज़ा क़ादरी

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