या सय्यिदी हबीबी ख़ैरुल अनाम आक़ा
अपने सलामियों का, ले लो सलाम आक़ा।
आए हैं हाथ ख़ाली, भर दो हुज़ूरे आली,
मांगे हैं आज तुमसे, मंगतों की ख़स्ता हाली।
रहमत की सुबह आक़ा, रहमत की शाम आक़ा।
या सय्यिदी हबीबी, ख़ैरुल अनाम आक़ा…
या रसूलल्लाह… सल्ले-अला… या हबीबी…
तुमसे ज़्यादा प्यारी, जान भी नहीं हमारी,
दोनों जहाँ मिले हैं, दहलीज़ पर तुम्हारी।
आक़ाइयां सभी हैं, तुम पर तमाम आक़ा।
या सय्यिदी हबीबी, ख़ैरुल अनाम आक़ा…
या रसूलल्लाह… सल्ले-अला… या हबीबी…
इसियाँ में घिरे हैं, मुजरिम बने खड़े हैं,
शर्मिंदा भी बहुत हैं, मुस्तहिक़ भी बड़े हैं।
हम को मुआफ़ कर दो, हम हैं ग़ुलाम आक़ा।
या सय्यिदी हबीबी, ख़ैरुल अनाम आक़ा…
या रसूलल्लाह… सल्ले-अला… या हबीबी…