आप शम्मे रिसालत हैं परवाने हम
अब हम आखिर यहाँ से किधर जाएंगे
ज़िंदगी तो हमारी इसी दर से है
आप से दूर होंगे तो मर जाएंगे
जिसने माँगा है क़तरा तो दरिया दिया
जिसने दामन पसारा उसे भर दिया
बस तुम्हारी सखावत हमको भरम
खाली दामन कभी हम न रह जाएंगे
ज़ात में हम तो सरवर नकारे सही
फिर भी निस्बत हमारी न्यारी सही
बस तुम्हारी शफ़ाअत पे हमको भरम
खुल्द में भी ऐ प्यारे अगर जाएंगे
मिस्ल-ए-परवाना हम आपको ढूंढते
सुब्ह-ए-सादिक़ भी आका अब होने को है
जबके दीदार हम आपका पाएंगे
गिर क़दमों में आका हम मर जाएंगे
जाएं अजमेर को, जाएं बगदाद को
शाह-ए-तैबा किसी के भी दरबार को
एक सवाल उनसे हरदम ये करते रहे
या वली कब मदीने को हम जाएंगे
अर्ज़ दिल से ये अशरफ की आका सुनो
हाँ! बज़ाहिर है नासिर के लब पर मगर
जब मैं आऊँ मदीने में दीदार को
कहना दीवाने अब तुम किधर जाओगे