रसूल-ए-मक्की रसूल-ए-मदनी !
अस्सलाम अस्सलाम अस्सलाम
अस्सलाम अस्सलाम अस्सलाम
सलाम, ऐ दो जहाँ के वाली !
रसूल-ए-मक्की रसूल-ए-मदनी !
सलाम, ऐ दो जहाँ के वाली !
वो शाह हो या कोई गदागर
ग़ुलाम बनता तेरा वो आ कर
जो देख ले तेरी ख़ुश-ख़िसाली
रसूल-ए-मक्की रसूल-ए-मदनी !
सलाम, ऐ दो जहाँ के वाली !
रसूल-ए-मक्की रसूल-ए-मदनी !
सलाम, ऐ दो जहाँ के वाली !
फ़लक से आ’ला मक़ाम उस का
जहाँ में रहता है नाम उस का
तुम्हारे दर का है जो सवाली
रसूल-ए-मक्की रसूल-ए-मदनी !
सलाम, ऐ दो जहाँ के वाली !
रसूल-ए-मक्की रसूल-ए-मदनी !
सलाम, ऐ दो जहाँ के वाली !
अस्सलाम अस्सलाम अस्सलाम
अस्सलाम अस्सलाम अस्सलाम
तेरे ही दम से है शान-ओ-शौकत
तेरी ही ख़ातिर है सारी ख़िल्क़त
वगरना ‘आलम था ख़ाली ख़ाली
रसूल-ए-मक्की रसूल-ए-मदनी !
सलाम, ऐ दो जहाँ के वाली !
रसूल-ए-मक्की रसूल-ए-मदनी !
सलाम, ऐ दो जहाँ के वाली !
हमारी जानें फ़िदा हों उस पर
हमारी नज़रें फ़िदा हों उस पर
वो जिस ने देखी है कमली काली
रसूल-ए-मक्की रसूल-ए-मदनी !
सलाम, ऐ दो जहाँ के वाली !
रसूल-ए-मक्की रसूल-ए-मदनी !
सलाम, ऐ दो जहाँ के वाली !
वसीला-ए-बीबी फ़ातिमा से
हमेशा, ‘अल्वी ! जो माँगा मैं ने
कभी न उस ने है बात टाली
रसूल-ए-मक्की रसूल-ए-मदनी
सलाम, ऐ दो जहाँ के वाली !
रसूल-ए-मक्की रसूल-ए-मदनी !
सलाम, ऐ दो जहाँ के वाली !
शायर:
अली मुहम्मद अल्वी
ना’त-ख़्वाँ:
हुसैन नागरी