ये काश उनके दर पर यूँ मौत मेरी आए
नज़रें झुकी हों मेरी, दिल नात गुनगुनाए।
मेरे रब मुझे अता हो दर-ए-मुस्तफ़ा का मंज़र,
वो हसीन सब्ज़ गुम्बद मेरी आँखों में समाए।
मैं चलूँगा झूम कर फिर ख़ुल्द-ए-बरीं की जानिब,
जो शफ़ी-ए-रोज़-ए-महशर मेरी हर ख़ता मिटाए।
आग़ोश खोले जन्नत उस को पुकारती है,
जो शख़्स अपनी माँ के क़दमों में लेट जाए।
ये ‘तमीम’ की दुआ है हालात-ए-पुर-अलम में,
मुझ पर करम हो आक़ा, रहें रहमतों के साए।