ए शाफ़-ए-उमम! शहे जी-जाह ले ख़बर
ए शाफ़-ए-उमम! शहे जी-जाह ले ख़बर
लिल्लाह ले ख़बर मेरी, लिल्लाह ले ख़बर
दरिया का जोश, नाव न बेड़ा न ना-ख़ुदा
मैं डूबा, तू कहाँ है मेरे शाह! ले ख़बर
मंज़िल कड़ी है, रात अँधेरी, मैं ना-बलद
ऐ ख़िज़्र! ले ख़बर मेरी, ऐ माह! ले ख़बर
पहुँचे पहुँचने वाले तो मंज़िल मगर शहा
उनकी जो थक के बैठे, सारे राह ले ख़बर
जंगल दरिन्दों का है, मैं बे-यार, शब क़रीब
घेरे हैं चार सिम्त से बदख़्वाह, ले ख़बर
मंज़िल नई, अज़ीज़ जुदा, लोग नाशनास
टूटा है कोह-ए-ग़म में, परे! क़ाह ले ख़बर
वो सख़्तियाँ सवाल की, वो सूरतें मुहीब
ऐ ग़मज़दों के हाल से आग़ाह ले ख़बर
मुजरिम को बारगाह-ए-अदालत में लाए हैं
तकता बए बे-कसी में तेरी राह, ले ख़बर
अहले-अमल को उनके अमल काम आएँगे
मेरा है कौन तेरे सिवा, आह! ले ख़बर
माना कि सख़्त मुजरिम-ओ-नक़ारा है रज़ा
तेरा ही तो है बन्दा-ए-दरगाह! ले ख़बर