बहार-ए-जाँ-फ़िज़ा तुम हो नसीम-ए-गुलसिताँ तुम हो

बहार-ए-जाँ-फ़िज़ा तुम हो, नसीम-ए-गुलसिताँ तुम हो
बहार-ए-बाग़-ए-रिज़वाँ तुम से है, ज़ेब-ए-जिनाँ तुम हो

ख़ुदा की सल्तनत का दो जहाँ में कौन दूल्हा है
तुम ही तुम हो, तुम ही तुम हो, यहाँ तुम हो, वहाँ तुम हो

हक़ीक़त से तुम्हारी जुज़ ख़ुदा और कौन वाक़िफ़ है
कहे तो क्या कहे कोई, चुनीं तुम हो, चुनाँ तुम हो

नज़र ‘आरिफ़ का हर आलम में आया आप का आलम
न होते तुम तो क्या होता, बहार-ए-हर जहाँ तुम हो

कुजा हम ख़ाक-उफ़्तादा, कुजा तुम ऐ शह-ए-बाला
अगर मिस्ल-ए-ज़मीं हम हैं तो मिस्ल-ए-आसमाँ तुम हो

ये क्या मैंने कहा मिस्ल-ए-समा तुम हो, मआज़ल्लाह
मुनज़्ज़ह मिस्ल से बरतर, ज़े हर वह्म-ओ-गुमाँ तुम हो

मैं भूला आप की रिफ़अत से, निस्बत ही हमें क्या है
वो कहने भर की निस्बत थी, कहाँ हम हैं, कहाँ तुम हो

हमें उम्मीद है रोज़-ए-क़यामत उनकी रहमत से
कि फ़रमाएँ: “इधर आओ! न मायूस अज़-जिनाँ तुम हो”

सितमकारो! सियाहकारो! ख़ताकारो! जफ़ाकारो!
हमारे दामन-ए-रहमत में आ जाओ, कहाँ तुम हो

तुम्हारे होते सारे दर्द-ओ-दुख किस से कहूँ प्यारे
शफ़ीअ-ए-आसियाँ तुम हो, वकील-ए-मुजरिमाँ तुम हो

रियाज़त के यही दिन हैं, बुढ़ापे में कहाँ हिम्मत
जो कुछ करना है अभी कर लो, अभी नूरी जवान तुम हो

फ़क़त निस्बत का जैसा हूँ, हक़ीक़ी नूरी हो जाऊँ
मुझे जो देखे कह उठे: “मियाँ नूरी मियाँ तुम हो”

Leave a Comment