दिल-ए-दर्दमंद की दास्ताँ न कहूँ जो तुम से तो क्या कहूँ

दिल-ए-दर्दमंद की दास्ताँ न कहूँ जो तुम से तो क्या कहूँ
तुम ही ग़मज़दों के हो क़द्रदाँ न कहूँ जो तुम से तो क्या कहूँ

मेरे हाल पर भी रहम करो मैं कहूँ जो अर्ज़ वो सुन तो लो
मेरे बाप माँ से हो महरबाँ न कहूँ जो तुम से तो क्या कहूँ

दम-ए-नज़अ ऐसी है बेबसी नहीं साथ देते हवास भी
मुझे छोड़ जाता है कारवाँ न कहूँ जो तुम से तो क्या कहूँ

जो लहद में मुझसे सवाल हो तुम ही आके उसका जवाब दो
ये बहुत ही सख़्त है इम्तिहाँ न कहूँ जो तुम से तो क्या कहूँ

जो अमीर देखे नबी इधर तो कहूँ ये हाथों को जोड़ कर के
तड़पते दिल को मैं नीम-जाँ न कहूँ जो तुम से तो क्या कहूँ

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