फ़िदा कर इश्क़-ए-नबी पर जान | ज़माना याद करेगा
फ़िदा कर ‘इश्क़-ए-नबी पर जान
मुकम्मल कर ले तू ईमान
ज़माना याद करेगा, ज़माना याद करेगा
दिन-रात तड़प ये रहती है, ऐ काश ! मदीना जाऊँ मैं
अल्ताफ़-ओ-करम की वादी से ता-‘उम्र न वापस आऊँ मैं
मेरे दिल का है यही अरमान
निछावर कर दूँ उन पर जान
ज़माना याद करेगा, ज़माना याद करेगा
जब याद नबी की आती है, इक कैफ़ का ‘आलम होता है
जब ज़िक्र-ए-नबी छिड़ जाता है, इक वज्द का मौसम होता है
यही तो कहता है क़ुरआन
कि आक़ा हैं जान-ए-ईमान
ज़माना याद करेगा, ज़माना याद करेगा
सरकार से तू है दूर मगर, सरकार तो तुझ से दूर नहीं
क्यूँ खोया खोया रहता है, मुख़्तार है तू मजबूर नहीं
नबी को पहले दिल से मान
नबी पे सब कुछ कर क़ुर्बान
ज़माना याद करेगा, ज़माना याद करेगा
अस्लाफ़ की है तारीख़ यही, साहिल पे जला दी है कश्ती
दौड़ाए हैं घोड़े दरिया पर, क्या ‘इश्क़-ए-नबी की मस्ती थी
तुम्ही हो वो मर्द-ए-मैदान
ज़रा ढूँडो अपनी पहचान
ज़माना याद करेगा, ज़माना याद करेगा
जो बात थी आ’ला हज़रत में, वो आज किसी हज़रत में नहीं
वो ‘इश्क़-ए-नबी का पैकर थे, थर्राते थे उन से दुश्मन भी
दिया हम को कंज़ुल-ईमान
ये है हम पर उन का एहसान
ज़माना याद करेगा, ज़माना याद करेगा
दरबार-ए-विलायत क्या कहना, जब उन का इशारा मिलता है
बरसों की डूबी कश्ती को इक पल में किनारा मिलता है
असद ! ये ग़ौस का है फ़ैज़ान
है जिस से नज्दी भी हैरान
ज़माना याद करेगा, ज़माना याद करेगा
शायर:
असद इक़बाल कलकत्तवी
ना’त-ख़्वाँ:
असद इक़बाल कलकत्तवी