हुसैन जैसा शहीद-ए-आ’ज़म जहाँ में कोई हुवा नहीं है
छुरी के नीचे गला है लेकिन किसी से कोई गिला नहीं है
‘अदू थे जब सर पे तेग़ तोले, हुसैन सज्दे में जा के बोले
मदीने वालो ! गवाह रहना, नमाज़ मेरी क़ज़ा नहीं है
पुकारे ‘अब्बास, ए सकीना ! मैं पानी लाऊँगा ख़ूब पीना
कटे हैं बाज़ू, छिदा है सीना, अभी मेरा सर कटा नहीं है
ग़रीब उम्मत की बेबसी पर हुसैन का सर कटा है लेकिन
यज़ीद जैसे शक़ी के आगे हुसैन का सर झुका नहीं है
हुसैन फ़रमाएँ साथियों से, अदा करो पुर-जलाल सज्दे
है तेग़, ख़ंज़र, तबर का साया, हमारा क्या अब ख़ुदा नहीं है ?
यज़ीद दुनिया में लाख आए, सितम किए और ज़ुल्म ढाए
चराग़-ए-तौहीद फिर भी, सादिक़ ! जला है लेकिन बुझा नहीं है
ना’त-ख़्वाँ:
क़ारी रियाज़ुद्दीन