इश्क़-ए-नबी में दिल तड़पाना, सब के बस की बात नहीं,
उनकी मोहब्बत में मर जाना, सब के बस की बात नहीं।
जिस पे नज़र सरकार की होगी, उस के लिए सब आसां है,
वरना दिल को तैबा बनाना, सब के बस की बात नहीं।
अबू बक्र का साथ ना छोड़े, हर मुश्किल में साथ रहे,
ग़ार-ए-सौर में साथ निभाना, सब के बस की बात नहीं।
खैबर का वज़नी दरवाज़ा, जिसको उठाए चालीस लोग,
मौला अली का तन्हा उठाना, सब के बस की बात नहीं।
दीन बचाए घर को लुटाए, हैं किरदार-ए-इमाम-ए- हुसैन (अ.स.),
हक़ के लिए सर अपना कटाना, सब के बस की बात नहीं।
ऐसी मिसालें मिलती नहीं हैं, जैसी हैं मेरे अशरफ़ की,
तख़्त-ए-हुकूमत को ठुकराना, सब के बस की बात नहीं।