जो भी दुश्मन है मेरे रज़ा का जल रहा था, जला है, जलेगा
मस्लक-ए-आला हज़रत का नारा लग रहा है, हमेशा लगेगा
बुग़्ज़ ओ कीना का चश्मा लगा कर, नज्दियों ने लिखा जो छुपा कर
आम हज़रत से तो छुप गया है, आला हज़रत से कैसे छुपेगा
बाद-अज़ाँ जिसकी दुनिया में शोहरत है रज़ा का सलाम-ए-मोहब्बत
मरहबा मुस्तफ़ा ﷺ जान-ए-रहमत, झूम कर उनका आशिक़ पढ़ेगा
वो रज़ा का घराना है प्यारे, इल्म का कारखाना है प्यारे
उनके तकसाल में जो ढलेगा, इल्म का इक हिमाला बनेगा
मुस्तफ़ा ﷺ की इनायत से प्यारे, ग़ौस-ए-आज़म की बरकत से प्यारे
अहल-ए-सुन्नत के बाज़ार में अब आला हज़रत का सिक्का चलेगा
ग़ौस ओ ख़्वाजा की बेशक अता है, हिन्द में एक अहमद रज़ा है
अहल-ए-सुन्नत का जो मुक़तदा है, वो बरेली में तुमको मिलेगा
वो रज़ा के चमन का सितारा, अहल-ए-सुन्नत के दिल का उजाला
अख़्तर-ए-क़ादरी सबके दिल पर राज करता है करता रहेगा
हाथ मलते रहे मलने वाले, लाख जलते रहे जलने वाले
ग़ौस ओ ख़्वाजा के लुत्फ़ ओ करम से आला हज़रत का डंका बजेगा
दूध माँगोगे हम खीर देंगे, वरना बाग़ी को हम चीर देंगे
रज़वियों से न ले कोई पंगा, वरना हश्मत का डंडा पड़े