क्या ही ज़ौक़ अफ़ज़ा शफ़ाअत है तुम्हारी वाह वाह
क्या ही ज़ौक़ अफ़ज़ा शफ़ाअत है तुम्हारी वाह वाह
क्या ही ज़ौक़ अफ़ज़ा शफ़ाअत है तुम्हारी वाह वाह
क़र्ज़ लेती है गुनाह परहेज़गारी वाह वाह
ख़मा-ए-क़ुदरत का हुस्न-ए-दस्तकारी वाह वाह
क्या ही तस्वीर अपने प्यारे की सवारी वाह वाह
उंगलियाँ हैं फ़ैज़ पर, टूटे हैं प्यासे झूम कर
नदियाँ पंजाब-ए-रहमत की हैं जारी वाह वाह
इस तरफ़ रोज़े का नूर, उस सिम्त मिंबर की बहार
बीच में जन्नत की प्यारी प्यारी क्यारी वाह वाह
नफ़्स ये क्या ज़ुल्म है, जब देखो ताज़ा जुर्म है
नतवॉँ के सर पर इतना बोझ भारी वाह वाह
अश्क़ शब भर इंतज़ार-ए-अफ़्व-ए-उम्मत में बहें
मैं फ़िदा चाँद और यूँ अख़्तर शुमारी वाह वाह
क्या मदीने से सबा आई कि फूलों में है आज
कुछ नई बूँ भिनी भिनी प्यारी प्यारी वाह वाह
परा-ए-दिल भी न निकला दिल से तोहफ़े में रज़ा
उन सगान-ए-कू से इतनी जान प्यारी वाह वाह