क्या जाने दुनिया वाले रुत्बा मेरे मदनी का,
खाता है सारा ज़माना सदक़ा मेरे मदनी का।
आल-ए-नबी, औलाद-ए-अली हैं, और फ़रज़ंद-ए-बतूल,
इनके चेहरे को देखो तो याद आते हैं रसूल।
ग़ौस-ए-आज़म की शबीह है चेहरा मेरे मदनी का।
वो हैं मुजद्दिद, वो हैं मुफ़स्सिर, हर सुन्नी के इमाम,
हम सब उनके टुकड़ों पर पलने वाले हैं ग़ुलाम।
मिलता है तैबा से हमको सदक़ा मेरे मदनी का।
रब के करम से हम को मिली शैख़-उल-इस्लाम की निस्बत,
हश्र में इस निस्बत से मिलेगी अशरफ़ियों को जन्नत।
चलता है दोनों जहाँ में सिक्का मेरे मदनी का।
लोग दीवाने बन जाते हैं, ऐसी है तासीर,
बातिल को रुसवा कर देती है उनकी तक़रीर।
दुनिया में सब से जुदा है लहजा मेरे मदनी का।
मेरे नबी और मौला अली, ग़ौस-ओ-ख़्वाजा भी होंगे,
क़ुत्ब-ओ-फ़रीद-ओ-निज़ाम-ओ-साबिर, अशरफ़-ए-सिमनां होंगे।
महशर में भी होगा ‘फ़ाज़िल’ जलसा मेरे मदनी का।