मैं तो खुद उनके दर का गदा हूँ
अपने आका को मैं नज़र क्या दूँ
अब तो आँखों में भी कुछ नहीं है
वरना कदमों में आँखें बिछा दूँ
आने वाली है उनकी सवारी
फूल नातों के घर-घर सजा दूँ
मेरे घर में अँधेरा बहुत है
अपनी पलकों पे शम्मे जला दूँ
रौज़ा-ए-पाक पेश-ए-नज़र है
सामने मेरे आका का दर है
मुझको क्या कुछ नज़र आ रहा है
तुमको लफ़्ज़ों में कैसे बता दूँ
मेरे आँसू बहुत क़ीमती हैं
इनसे वाबस्ता है उनकी यादें
इनकी मंज़िल है ख़ाक-ए-मदीना
ये गোহऱ यूँ ही कैसे लुटा दूँ
मैं फ़क़त आप को जानता हूँ
और उसी दर को पहचानता हूँ
इस अँधेरे में किसको पुकारूँ
आप फरमाएँ किसको सदा दूँ
क़ाफ़िले जा रहे हैं मदीने
और हसरत से मैं तक रहा हूँ
या लिपट जाऊँ क़दमों से उनके
या क़ज़ा को मैं अपनी सदा दूँ
मेरी बख़्शिश का सामान यही है
और दिल का भी अरमान यही है
एक दिन उनकी ख़िदमत में जाकर
उनकी नातेँ उन्हीं को सुना दूँ
मुझको इक़बाल निस्बत है उनसे
जिनका हर लफ़्ज़ जाने-सुकून है
मैं जहाँ नात अपनी सुना दूँ
सारी महफ़िल की महफ़िल जगा दूँ