पीर मेरे बग़दादी ग़ौस उल अनाम

पीर मेरे बग़दादी ग़ौस उल अनाम
वोह हैं मेरे आक़ा, मैं उन का ग़ुलाम

चहीते ख़ुदा और रसूले ज़मन के
हक़ीक़त में हैं लाडले पंजतन के

हैं कुल औलिया के वही तो इमाम
बड़ी शान वाले मेरे ग़ौसुल अनाम

चराग़े विलायत, वलीये मुकर्रम
करामत की शोहरत ज़माने में आम

बात ऐसी वलियों में, नहीं है किसी की
बुलंद ऐसी है ग़ौसुल आज़म की हस्ती

हर सिम्त मची है, उन्ही की धूम-धाम
ग़ौस के ही कांधे पर क़दम हैं नबी के

क़दम ग़ौस के, कांधे पर हर वली के
ये है उन का रुतबा, ये आला मक़ाम

क़ादरी मयख़ाना और ग़ौस मेरे साक़ी
कैसे रहेगी फिर मेरी रूह प्यासी

मारिफ़त का मुझ को वही दें जाम
दिल से उन्हे एक बार, जिस ने पुकारा

उस को मिला अल्लाह के, करम का सहारा
सब पे तजल्ली है यही सुब्हो शाम

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