पुल से उतारो राह-गुज़र को ख़बर न हो
जिब्रील पर बिछाएँ तो पर को ख़बर न हो।
काँटा मेरे जिगर से ग़म-ए-रोज़गार का,
यूँ खींच लीजिए कि जिगर को ख़बर न हो।
फ़रियाद उम्मती जो करे हाल-ए-ज़ार में,
मुमकिन नहीं कि ख़ैर-ए-बशर को ख़बर न हो।
ऐसा गुमा दे उन की विला में ख़ुदा हमें,
ढूँढा करे पर अपनी ख़बर को ख़बर न हो।
ऐ ख़ार-ए-तयबा! देख कि दामन न भीग जाए,
यूँ दिल में आ कि दीदा-ए-तर को ख़बर न हो।
उन के सिवा, रज़ा! कोई हामी नहीं जहाँ,
गुज़रा करे पिसर पे पिदर को ख़बर न हो।