रुख़-ए-सरकार सा कोई नज़ारा हो नहीं सकता

रुख़-ए-सरकार सा कोई नज़ारा हो नहीं सकता
ज़माने में मुहम्मद (स.अ.व.) सा प्यारा हो नहीं सकता

शब-ए-मेअराज रब बोला यही महबूब से मिल कर
तुम्हारा जो नहीं होता हमारा हो नहीं सकता

जन्नत में भी सब जन्नती यही कहते थे मौला से
क्या दीदार तैबा का दोबारा हो नहीं सकता

हो दीवाना मुहम्मद (स.अ.व.) का जले नार-ए-जहन्नुम में
किसी भी तौर पे ये उन को गवारा हो नहीं सकता

जो ज़ुल्फ़ों से न मस हो तो घटा काली नहीं होती
जो क़दमों से न लिपटे तो सितारा हो नहीं सकता

जहां पर भी गिरे हाकिम मेरे आक़ा उठा लेना
तेरे जैसा दो आलम में सहारा हो नहीं सकता

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