फरिश्तों तुम भी आ जाओ नबी की नात लिखनी है

 

 

फरिश्तों तुम भी आ जाओ नबी की नात लिखनी है
क़लम जन्नत से ले आओ नबी की नात लिखनी है।

हवाओं आओ शहरे सरवरे कौनेन से होकर
हमारी फ़िक्र मेहकाओ नबी की नात लिखनी है।

हमारे दिल की तख्ती मुश्क से महकादो मद्दाहों
इसे ज़मज़म से धुलवाओ नबी की नात लिखनी है।

क़लम काग़ज़ लिए बैठा हूं आओ बुलबुले सिद्रा
नबी की नात लिखवाओ नबी की नात लिखनी है।

हमारी फ़िक्र में आए हुए लफ़्ज़ों से ये कहदें
हंसो इतराओ मुस्काओ नबी की नात लिखनी है।

नकीरों बाद में अहमद से कर लेना सुवाल अपना
ज़रा सा तुम ठहर जाओ नबी की नात लिखनी है।

शायर: अली अहमद रज़वी
नातख़्वां: अहमदुल फत्ताह

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